खेत बने सरहद, किसान बने चौकीदार! सांड और जंगली सूअरों के बीच जूझता किसान..


  • सरकार से पहले खुद मोर्चे पर किसान, खेतों में इंसानी बाल डाल रहे लोग
  • जंगली जानवरों का आतंक, रातें हो रहीं पहरे में गुज़ार
  • एक रात में बर्बाद हो रही महीनों की मेहनत
  • रात में खेत, दिन में मजदूरी — जंगली सूअरों ने किसानों की जिंदगी बना दी पहरेदारी
  • आलू की फसल पर हमला, टॉर्च लेकर रातभर जाग रहे किसान
  • बालों की लकीर से सूअरों को रोकने की कोशिश
  • नींद छोड़ खेत बचा रहे किसान 
  • तारबंदी के बाद भी नहीं रुका हमला, अब सूअरों से जूझ रहे किसान
  • अलाव, टॉर्च और डर… ऐसी कट रही है किसानों की सर्द रातें

ग्राउंड रिपोर्ट/ राकेश शर्मा 
आगरा। रात के सन्नाटे में खेत के किनारे एक टिमटिमाती टॉर्च की रोशनी दिखती है। ठंडी हवा चल रही है, लेकिन खेत के मेड़ पर बैठे किसान की आँखों में नींद नहीं, चिंता है, क्योंकि गाँवों के खेत अब खेत कम, किसी सीमा चौकी जैसे ज़्यादा दिखने लगे हैं। फर्क बस इतना है कि यहाँ देश की नहीं, अन्न की हिफाज़त हो रही है… और चौकीदार कोई जवान नहीं, बल्कि खुद किसान है। हाथ में डंडा, कान हर आहट पर खड़े। वजह — फसल नहीं, मानो जंग का मैदान बन चुके खेत हैं। पहले किसानों की सबसे बड़ी मुसीबत छुट्टा सांड थे। फसल तैयार होती नहीं कि झुंड के झुंड खेतों में घुस जाते। महीनों की मेहनत एक रात में बर्बाद हो जाती। मजबूर होकर किसानों ने कर्ज लेकर खेतों के चारों ओर तारबंदी करवाई।  जिससे खेत अब सचमुच “बॉर्डर” जैसे दिखने लगे — कांटेदार तार, लकड़ी और पत्थरों के खंभे और हर कोने पर चौकसी। 
लेकिन मुसीबत ने रास्ता बदल लिया।
 आगरा जिले के ब्लॉक जगनेर स्थित गाँव खोरपुरा चाचोंद के 
 इलाके में बरेला (जंगली) सूअरों का आतंक छाया हुआ है। ये झुंड बनाकर रात के अंधेरे में खेतों पर धावा बोलते हैं और खासकर आलू की फसल को भारी नुकसान पहुँचा रहे हैं। किसान बताते हैं कि सूअर मिट्टी खोदकर पूरी क्यारी ही उलट देते हैं। जहाँ कल तक हरी फसल लहलहा रही थी, वहाँ सुबह सिर्फ गड्ढे और बर्बादी दिखती है।
जंगली सूअरों द्वारा खोदी गई आलू की फसल

खेत नहीं, जैसे शिकारगाह बन गए हों 
गाँव के आसपास के खेतों में इन दिनों अजीब सा डर पसरा है। दिन में जहाँ हरी फसल लहलहाती दिखती है, वहीं रात होते ही वह खेत जंगली जानवरों के हमले का निशाना बन जाते हैं, जिससे किसानों की हालत ऐसी हो गई है कि मानो रात अब सोने के लिए नहीं, पहरा देने के लिए होती है। कोई टॉर्च लेकर खेत की मेंड़ पर बैठा है, तो कोई अलाव जलाकर आवाज करता रहता है ताकि जानवर पास न आएँ। कई किसान परिवारों ने तो खेतों के पास अस्थायी झोपड़ी तक बना ली है।
हर किसान की आँखों में थकान साफ झलकती है। वो कहते हैं,
"दिन में मजदूरी करो, रात में चौकीदारी… खेती अब खेती नहीं, जंग बन गई है साहब।"

खेत की मेड़ के पास बिखरे इंसानी बाल

बालों की दीवार — देसी जुगाड़ में उम्मीद
 आवारा सांड झुंड में खेतों में घुसते हैं और खड़ी फसल रौंदकर चले जाते हैं। वहीं जंगली बरेला सूअर जमीन खोदने में माहिर होते हैं। खासकर आलू की फसल उनके लिए आसान शिकार है। किसान  बताते हैं कि एक रात में आधा खेत साफ हो जाता है — जैसे किसी ने फावड़ा चलाकर खुदाई कर दी हो।
सुबह जब किसान खेत देखने पहुँचते हैं, तो हरी पत्तियों की जगह मिट्टी उलटी पड़ी मिलती है और आलू बिखरे पड़े होते हैं।
सरकारी मदद या ठोस समाधान के इंतज़ार में बैठे रहने की बजाय किसान अपने स्तर पर हर संभव तरीका आजमा रहे हैं। इन्हीं कोशिशों में एक अनोखा देसी उपाय सामने आया है — खेतों के चारों ओर इंसानी बाल बिखेरना।
स्थानीय मान्यता है कि इंसानी गंध से जंगली सूअर डरते हैं और खेत में घुसने से कतराते हैं साथ ही कुछ किसानों का कहना है कि इंसानी बाल जंगली सुअरों की नाक में घुस जाते हैं जिससे वो खेतों में नहीं घुसते।  यही वजह है कि किसान नाई की दुकानों से बोरे भर-भर कर बाल ला रहे हैं और खेत की मेड़ों के आसपास डाल रहे हैं। कई जगहों पर ये “बालों की लकीर” अब नई सुरक्षा दीवार बन गई है।
हालाँकि यह उपाय पूरी तरह सफल है या नहीं, यह कहना मुश्किल है, लेकिन उम्मीद ही इस वक्त किसानों की सबसे बड़ी ताकत है।

रातें खेतों में, घरों में बेचैनी
अब हालात ऐसे हैं कि किसानों को रात खेतों में ही गुजारनी पड़ रही है। कोई टीन का डिब्बा बजाता है, कोई पटाखे छोड़ता है, तो कोई टॉर्च की रोशनी घुमाकर जानवरों को भगाने की कोशिश करता है।
लेकिन खतरा सिर्फ फसल का नहीं है। “सूअर झुंड में होते हैं, अगर घिर गए तो जान का भी डर रहता है,” एक बुजुर्ग किसान बताते हैं। कई बार जानवर अचानक हमला करने की मुद्रा में दौड़ पड़ते हैं, जिससे खेतों की रखवाली कर रहे लोग दहशत में आ जाते हैं।

मेहनत पर पानी, कर्ज का डर
खेती पहले ही महंगी हो चुकी है — बीज, खाद, सिंचाई सब पर खर्च बढ़ा है। ऐसे में जब फसल तैयार होने के समय बर्बाद हो जाए, तो किसान के लिए यह सिर्फ नुकसान नहीं, बल्कि साल भर की उम्मीद टूटने जैसा है, क्योंकि उनके लिए यही फसल साल भर के घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और परिवार की रोटी का सहारा है।

प्रशासन से उम्मीद, समाधान का इंतज़ार
खेतों की ये जंग अब लंबी होती जा रही है। पहले सांड, अब सूअर… किसान पूछ रहे हैं कि आखिर उनकी मेहनत की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या हर बार उन्हें ही अपनी जान जोखिम में डालकर पहरा देना होगा?
स्थानीय प्रशासन और वन विभाग से ग्रामीणों की  मांग है कि आवारा पशुओं की व्यवस्था की जाए और जंगली सूअरों से बचाव के ठोस इंतजाम किए जाएँ।
लेकिन जब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक किसान की हर रात ऐसे ही कटती रहेगी — टॉर्च की रोशनी, डंडे का सहारा, ठंडी रातों में जागता हुआ किसान और दिल में यह डर कि अगली सुबह खेत में कितना नुकसान मिलेगा।

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